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🚩 🌺माँ दुर्गा सेवा समिति एवं नव युवक रामलीला समिति, बादशाह नगर, बाराबंकी • पावन नवरात्रि महोत्सव एवं भव्य रामलीला में आपका हृदय से हार्दिक स्वागत करती है • माँ दुर्गा का आशीर्वाद आप सभी पर सदैव बना रहे 🌺 🚩जय माता दी 🚩
श्लोक

श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता
1. निष्काम कर्म का सिद्धांत (अध्याय 2, श्लोक 47) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए कर्म के फल की इच्छा से कभी कर्म मत करो और न ही तुम्हारी रुचि कर्म न करने (अकर्मण्यता) में हो। सार: परिणाम की चिंता किए बिना केवल अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करना ही मानसिक शांति और सफलता की कुंजी है। 2. आत्मा की अमरता (अध्याय 2, श्लोक 22) वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्ण्यान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ अर्थ: जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ शरीर को त्यागकर नया भौतिक शरीर धारण करती है। सार: मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा शाश्वत है। यह श्लोक मृत्यु के भय और जीवन में होने वाले परिवर्तनों को सहजता से स्वीकार करना सिखाता है। 3. धर्म की रक्षा का वचन (अध्याय 4, श्लोक 7-8) यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ अर्थ: हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ। सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ। सार: यह श्लोक विश्वास दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी बढ़ जाए, अंततः सत्य और न्याय की ही जीत होती है। 4. मन का नियंत्रण और आत्म-उत्थान (अध्याय 6, श्लोक 5) उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ अर्थ: मनुष्य को अपने मन के द्वारा स्वयं का उद्धार करना चाहिए, स्वयं का पतन नहीं होने देना चाहिए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है। सार: यदि आपका मन आपके वश में है तो वह आपका सबसे बड़ा मित्र है, लेकिन यदि वह अनियंत्रित है तो आपसे बड़ा आपका कोई शत्रु नहीं। 5. पूर्ण शरणागति (अध्याय 18, श्लोक 66) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ अर्थ: सभी प्रकार के धर्मों (कर्तव्यों और चिंताओं) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों और कष्टों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो। सार: यह गीता का अंतिम और परम संदेश है। अहंकार छोड़कर सर्वशक्तिमान पर पूर्ण समर्पण करने से व्यक्ति हर प्रकार के भय, अपराधबोध और चिंता से मुक्त हो जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता

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1. निष्काम कर्म का सिद्धांत (अध्याय 2, श्लोक 47) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए कर्म के फल की इच्छा से कभी कर्म मत करो और न ही तुम्हारी रुचि कर्म न करने (अकर्मण्यता) में हो। सार: परिणाम की चिंता किए बिना केवल अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करना ही मानसिक शांति और सफलता की कुंजी है। 2. आत्मा की अमरता (अध्याय 2, श्लोक 22) वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्ण्यान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ अर्थ: जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा व्यर्थ शरीर को त्यागकर नया भौतिक शरीर धारण करती है। सार: मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा शाश्वत है। यह श्लोक मृत्यु के भय और जीवन में होने वाले परिवर्तनों को सहजता से स्वीकार करना सिखाता है। 3. धर्म की रक्षा का वचन (अध्याय 4, श्लोक 7-8) यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ अर्थ: हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ। सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ। सार: यह श्लोक विश्वास दिलाता है कि चाहे बुराई कितनी भी बढ़ जाए, अंततः सत्य और न्याय की ही जीत होती है। 4. मन का नियंत्रण और आत्म-उत्थान (अध्याय 6, श्लोक 5) उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ अर्थ: मनुष्य को अपने मन के द्वारा स्वयं का उद्धार करना चाहिए, स्वयं का पतन नहीं होने देना चाहिए। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है। सार: यदि आपका मन आपके वश में है तो वह आपका सबसे बड़ा मित्र है, लेकिन यदि वह अनियंत्रित है तो आपसे बड़ा आपका कोई शत्रु नहीं। 5. पूर्ण शरणागति (अध्याय 18, श्लोक 66) सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ अर्थ: सभी प्रकार के धर्मों (कर्तव्यों और चिंताओं) को त्यागकर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों और कष्टों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो। सार: यह गीता का अंतिम और परम संदेश है। अहंकार छोड़कर सर्वशक्तिमान पर पूर्ण समर्पण करने से व्यक्ति हर प्रकार के भय, अपराधबोध और चिंता से मुक्त हो जाता है।
भक्तिमय ध्वनि